विशेष रुप से प्रदर्शित

एक पागल लड़की

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हर रोज यूँ ही एक पागल लड़की मुझको याद आ जाती है,
किताबों के पन्नों पर जब उसका नाम नजर आ जाता है,

भूली सी उस याद को फिर से याद दिला जाता है,

मायूस से इस चेहरे पर एक मुस्कान सी छा जाती है,

हर रोज यूँ ही एक पागल लड़की मुझको याद आ जाती है।

दीदार ऐ तमन्ना लिए जब हम घर से निकलते हैं,

सरेराह उसी एक चेहरे के सपने पलते हैं,

गलियों में उसकी परछाई भी नजर नही आती है,

दीदार ऐ तमन्ना फिर धरी की धरी रह जाती है,

हर रोज यूँ ही एक पागल लड़की मुझको याद आ जाती है,

जब वो पहली बारिश धरती पर पड़ती है,

मिट्टी भी हवाओं में एक इत्र सा छिड़कती है,

जब धरती की गोद में हरियाली सी छा जाती है,

हर रोज यूँ ही एक पागल लड़की मुझको याद आ जाती है,
आसमां भी धरती की याद में जब घुट घुट के रोता है,

बादल भी तब बारिश बनके धरती को खूब भिगोता है,

धरती भी आंसू को जब नदियाँ बनके बहाती है,

हर रोज यूँ ही एक पागल लड़की मुझको याद आ जाती है,

मिलना हो उसे अगर जिनते खाक में ढूंढना,

वो सख्स है जो अब जमाने में नहीं रहता।

तकिये पर ख्वाब देखना भूल गया है वो,

तुम्हारा खत शायद उसके सिरहाने नही रहता।

मिलोगे तो मिलोगे निजामते दरगाह में उससे,

वो जो सख्स था अब मैखाने में नही रहता।

मोहब्बते रिवाज में दिए थे जो फूल उसे मैंने,

वो फूल भी अब उसके किताबो में नही रहता।

कभी उन आंखों को कहा था आईना मैंने,

अब तो मैं भी उस आईने में नही रहता।

तु अब थकेगा नहीं।

घनघोर घटायें छाये 

काले बादल भले मंडरायें,

तु अब थकेगा नहीं।

एक उम्र गुजार चुका अंधेरे को रोशनी समझ कर

अब चलेगा उस राह अंगारे बिछे हो जहाँ पर,

 अब एक पल भी तु रुकेगा नहीं,

देख कर मंजिल की तरफ अब पीछे मुड़ेगा नहीं

बस कर बहुत हुआ, तु अब थकेगा नहीं,

अब फर्क पड़ता है उसे,

मुझे खोने से,मेरे ना होने से 

अपनी दुनिया में खुद को खोने से,

अब फर्क पड़ता है उसे,

कब मनाया था दिल ने उसे,

खामोशी

क्यों तू अब खामोश हो गया,

ना जाने अब तू कहाँ खो गया,

हर रात सोने की बात कर देर तक जागना

हर रोज तेरा मुझसे अपनी हर बात बांटना

क्यों न जाने अब कम हो गया

क्यों तु अब खामोश हो गया।

कैसे कहूं तेरी हर रोज याद आती है

कैसे बताऊँ तेरी यादें मुझे कितना सताती है,

अब तो तू भी मुझे तन्हा छोड़ गया

बता मुझे क्यों अब तू खामोश ही गया।

कभी मिलों जो मुझसे तुम तो बताऊं तुम्हे

हर एक जज्बात मेरे गिन गिन के समझाऊं तुम्हे

तू अब उस चाँद से भी दूर हो गया

बता मुझे कि तु अब क्यों खामोश हो गया।

याद आती है मुझे हर एक बात तेरी 

लगता ही नही की तू नही है मेरी

ये दर्द भी मेरा अपना सा हो गया

तू ही बता ना अब तु क्यों खामोश हो गया

शायरी छोड़ दी मैंने,

कभी लिखता था तेरे नूर पर नग्मे सजाकर के,

कभी सोचा था उस चाँद को अपना बनाकर के,

जबसे तुम्हारे ख्वाब का मुआयना किया मैंने

कलम को दूर कर खुद से, शायरी छोड़ दी मैंने।

कभी ढूंढ़ी थी तेरे आंखों में परछाईया अपनी

कभी भुला था मैं भी तेरी खातिर तन्हाईयाँ अपनी

जबसे तुम्हे देखा किसी के ख्वाबों में मैंने

कसम लेकर तेरे इस नुर की जाना, शायरी छोड़ दी मैंने ।

कभी शौक था मुझको तेरे नग्मे सुनाने का,

तेरी इन जुल्फों में खोकर तुझे अपना बनाने का,

तेरे रूबरू होकर तुझे जाना जो मैंने

खुदा को याद कर हरदम, शायरी छोड़ दी मैंने।

तेरी याद

तु हर रोज याद आ जाता है,

तुम्हारे ख्याल से शुरू होता हुआ दिन मेरा,

बस तुम्हारे ही ख्याल तक पहुच पाता है,

कोशिश मेरी रहती है हर रोज भूल जाऊँ तुझे

तेरा ही ख्याल हर घड़ी जाने क्यों सताता है..?

तु हर रोज याद आ जाता है,